बलौदा,29 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की भोजली तिहार,
मित्रता दिवस के रूप में , जवारा ,दौनापान,मितान, महाप्रसाद ,गियां बनाते है।
नगर के श्याम बाजार में वर्षों पुरानी परम्परा अनुसार नगर की विभिन्न समाजों की माताएँ बहने, और बच्चियों के द्वारा उनके घरों से लाई भोजली और छत्तीसगढ़ का यह पर्व नगर की परम्परा को संजोने प्रोत्साहित करने के लिए आज शाम भोजली कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नगर पंचायत अध्यक्ष कविता डहरिया उपाध्यक्ष नगर पंचायत कृष्ण कुमार सोनी मंच में अध्यक्षता नर्मदा प्रसाद सोनी अतिथि जितेंद्र सोनी ,दत्ता देवांगन,प्रवीण डहरिया, श्रीमती उमा सोनी,श्रीमती उषा सोनी ,श्रीमती ताराबाई सोनी श्रीमती कृष्णाबाई सोनी ,श्रीमती सरस्वती सोनी, रीना सोनी ,संध्या सिंह ठाकुर भोजली की पूजा अर्चना कर बड़े ही धूमधाम से मनाया गया सभी भोजली प्रतिभागियों को भोजली प्रोत्साहन के पुरस्कार प्रदान किया गया ।इस अवसर पर नगर की बड़े संख्या में महिलाएं पुरुष,माताएँ, और बच्चियां उपस्तिथ रही।
सेवा आराधना का पर्व-
नवरात्र में माता की सेवा आराधाना का पर्व जैसे,छत्तीसगढ़ की प्रमुख फ़सल की अच्छी पैदावार, जल भूमि में जल की अच्छी उपलब्धता के लिए भोजली की बोया जाता है।
भोजली के सम्मान में देवी-गीतों को गाकर जवांरा– जस – सेवा गीत गाया जाता है वैसे ही भोजली दाई (देवी) के सम्मान में भोजली सेवा गीत गाये जाते हैं। सामूहिक स्वर में गाये जाने वाले भोजली गीत छत्तीसगढ की शान हैं। खेतों में इस समय धान की बुआई व प्रारंभिक निंदाई, गुडाई का काम समापन की ओर होता है। किसानों की घरों की महिलाएं माताएं, बहने बच्चियां अच्छी वर्षा एवं भरपूर भंडार देने वाली फसल की कामना करते हुए फसल के प्रतीकात्मक रूप से भोजली का आयोजन करती हैं।
प्रकृति की संस्कृति के दर्शन-

छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति प्रकृति और अध्यात्मिक संस्कृति की मिलीजुली संस्कृति है। इसीलिए यहां की संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्म से संबंधित अनेक पर्व और संस्कृति का दर्शन होता है।सावन माह के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला भोजली पर्व मूलतः बहु बेटियों का ही पर्व है। सुहागिन महिलाएँ एवं कुंआरी कन्या टोकनी में मिट्टी भर कर धान, जौं, उड़द बोती हैं। पहले इसे नागपंचमी के दिन मिट्टी लाकर बोया जाता था। लेकिन समय के साथ अखाड़ा की परंपरा विस्मृत होने लगी। आजकल इसे पंचमी से लेकर नवमी तिथि तक सुविधा अनुसार बोते देखा जाता है। इसे श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने वाले पर्व राखी के दूसरे दिन राखी चढ़ाने के पश्चात विसर्जित किया जाता है। रोज इसकी पूजा करते हैं। भोजली गीत गाकर सेवा करते हैं। दीपक जलाते हैं। इसे ही हम भोजली का पर्व कहते हैं।
छत्तीसगढ़ की मितानी, सखी बदाई का पर्व-
छत्तीसगढ़ में यह मितानी याने मित्रता का प्रतीक है। सप्ताह भर तक घर में रखने के बाद बेटियां या बहुएँ इसे सिर पर या हाथ में लेकर तालाब में विसर्जन करने जाती हैं। राखी के दूसरे दिन इसे ठंडा किया जाता है।
कुछ भोजली को रख लेते हैं। टोकनी में भोजली को रख कर बड़ों को देकर प्रणाम करते हैं। छोटों को देकर प्यार देते हैं। इसके अलावा इस दिन एक दूसरे के कान में लगा कर एक नारियल देकर मित्रता की शरुवात करतें हैं। भोजली में भोजली देकर मित्रता बदते हैं वह तीन पीढ़ी तक तो चलती है। यह रिस्ता सगे से भी बढ़कर होता है।लोग एक दूसरे के घर आते जाते हैं रहते हैं। एक दूसरे को बहुत सम्मान देते हैं। इसमें मित्रता करने वाले एक दूसरे का नाम नहीं लेते हैं। एक दूसरे को भोजली कहते हैं। इसी प्रकार से दौनापान, जंवारा, महाप्रसाद गिया, भी बदते जिसने अलग अलग क्षेत्रों में कई नामों से सम्बोधित करतें हैं। यह सब अलग अलग समय पर होता है पर भोजली हमारे लिये मित्रता दिवस ही है।
