बलौदा, 22 सितंबर 2025
शक्ति की आराधना के महापर्व नवरात्रि का शुभारंभ हो चुका है इस नवरात्रि पर्व में देशभर में माता के अलग-अलग रूपों की आस्था और विश्वास के साथ पूजा की जा रही है. देवी के मंदिर में श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर पहुंच रहे हैं. वहीं जिला जांजगीर चांपा के लोग भी नवरात्रि धूम धाम के साथ मना रहे हैं. हम आपको एक ऐसे ही देवी मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जहां माता का श्रृंगार पेड़-पौधों ने किया है और इन पेड़ों की रक्षा स्वयं माता रानी करती हैं. इस कारण से ही यहां सराई (साल) के पेड़ के नाम पर माता का नाम पड़ा है. लोग मां को सरई श्रृंगारणी के रूप में भी जानते हैं.
छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिला के बलौदा नगर पंचायत से लगा हुआ गांव है डोंगरी. यहां मां सरई श्रृंगारिणी का मंदिर है. यहां चारों तरफ सराई (साल) के वृक्ष के साथ अन्य कई प्रकार के विशालकाय वृक्ष हैं, जिससे माता रानी का दरबार सजा हुआ है. कहा जाता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को शीतलता और शांति मिलती है. साथ ही माता श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं भी पूरी करती हैं. इसलिए भी माता रानी के प्रति यहां श्रद्धालुओं का अनूठा विश्वास है. यहां चैत्र और क्वांर शारदीय नवरात्रि में श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश ,जवा कलश प्रज्ज्वलित कराते है.
*सरई का पेड़ काटकर रख दिया था*
ग्राम डोंगरी के कमल किशोर सिंह (ग्राम सचिव) के अनुसार हमारे पूर्वजों ने बताया था कि मां सरई श्रृंगार धाम में जो सराई के वृक्ष हैं, उनके महत्व के बारे में 400 साल पहले भिलाई गांव के एक साहू समाज के व्यक्ति था. उस व्यक्ति ने जंगल में लकड़ी काटने जाते समय सरई का पेड़ काटकर रख दिया था. दूसरे दिन उसे लकड़ी लेने जब वह गाड़ा (बैल गाड़ी) लेकर पहुंचा तो उसने देखा कि पेड़ की कटी हुई लकड़ी नहीं मिल रही थी, बल्कि पेड़ फिर से वहीं पर खड़ा था.
*श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है*
गाड़ा लेकर पहुंचे शख्स ने फिर से उस वृक्ष को कटाई का प्रयास किया, लेकिन माता ने उसे रोका और उसे समझाया कि पेड़ को छोड़ देने की जरूरत है. इसके बाद भी व्यक्ति ने लकड़ी काटना जारी रखा, पेड़ काटने के बाद पुनः उसी स्थान में खड़ा हो जाता था, इस घटना के बाद भय से पेड़ काटना बंद कर , साहू समाज के लोग वनदेवी की आराधना करने लगे और पेड़ों की कटाई से डरने लगे.
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविधालय ने की पुष्टि
*गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय* बिलासपुर के प्रोफेसरों की एक टीम यहां आकर इस वृक्ष के वर्षो पुराने होने और कटने के बाद पुनः खड़े होने की पुष्टि कर चुके है।
इसके बाद मंदिर के गर्भगृह में अखंड ज्योति जलाई गई,और धूनी भी अनवरत जो आज भी करीब 35 साल से जल रही है.यहां आने वाले भक्तो के लिए यह मंदिर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और ओडिशा के श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है.
