बलौदा,29 सितम्बर 2025
कलश, दिया,मटकी, और मिट्टी के बर्तन दैनिक जीवन में हमारें लिए कितना उपयोगी है….!
लेकिन हम उनका कीमत और महत्त्व नहीं दे पाते।
किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, व्रत-त्योहार में कुम्हारों द्वारा बनाए गए कलश, दीये, मटके आदि की अनिवार्यता होती है। ये मिट्टी की वस्तुएं न केवल सांस्कृतिक महत्व रखती हैं, बल्कि कुम्हार समाज की रोजी-रोटी का आधार भी हैं, परंतु आज के दौर में इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े लोगों का दर्द शायद ही किसी को नजर आता हो। मेहनत से पसीना बहाकर मिट्टी को आकार देने वाले इन हाथों की कमाई, उनकी लागत और पसीने के अनुरुप नहीं है।
हमारें छत्तीसगढ़ में त्यौहारों की शुरुवात हरेली बाद, महिलाओं की तीजा,पोरा,खमरछठ, से प्रारम्भ होती है जहां मिट्टी के पोला,बैल गाडी,चुकिया खमरछठ ,में अनिवार्य है, गणेश ,विश्वकर्मा जी, और माँ दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण नवरात्र की शुरुआत से पहले और दीपोत्सव के आगमन के साथ ही कुम्हारों के लिए व्यस्तता का दौर शुरू हो गया है।
यही समय होता है जब वे साल भर की आय का एक बड़ा हिस्सा कमाने की उम्मीद में जुट जाते हैं। कुम्हार बताते हैं कि पहले मिट्टी आसानी से आसपास के खेतों से मिल जाती थी, लेकिन अब उन्हें मिट्टी खरीद कर लानी पड़ती है। 1000 से 200 रुपए प्रति ट्रैक्टर मिट्टी की लागत आती है। मिट्टी को आकार देने के लिए लगने वाली अथक मेहनत का मोल बाजार में नहीं मिल पाता। लोग मिट्टी की चीज़ों को केवल मिट्टी समझकर, औने-पौने दामों में खरीदने की कोशिश करते हैं। यह रवैया उन्हें बहुत आहत करता है।
-सही दाम न मिलने से काम छोडऩे का मन करता है, लेकिन इसके अलावा हमें कोई दूसरा काम आता भी नहीं और यह हमारा खानदानी पेशा है, इसलिए लगे हुए हैं। जब लोग बाज़ारों में दीयों का मोलभाव करते हैं, तो दिल को बहुत ठेस पहुँचती है। लोग मिट्टी का मोल नहीं समझते, यही मिट्टी हमारे घर की रोटी-रोजी है। 20 रुपए दर्जन दीये बेचने पर भी लोग सस्ते में मांगते हैं।
*कुम्हार बताते हैं कि*
पहले की बात अलग थी, जब वे खुद कहीं से भी मिट्टी खोदकर ले आते थे।अब मिट्टी खरीदनी पड़ती है। अगर लोगों को मिट्टी का मोल नहीं, तो कम से कम हमारी मेहनत के मोल का ध्यान रखना चाहिए।
*रात-दिन मेहनत करते हैं कि*
बाज़ारों में दीयों की कमी ना हो, हर घर तक दीये पहुँचें, जिससे दीपोत्सव के दिन दियों के उजालों में सचमुच आपको अपना दिवाली का अहसास हो।
