नईदिल्ली,12 मार्च ।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ओ बो सी आरक्षण से जुड़े ‘क्रीमी लेयर’ के सवाल पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को क्रीमी लेयर में रखने का निर्णय केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सवाल पर सामाजिक स्थिति और माता-पिता की सेवा-स्थिति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यह फैसला रोहित नाथन बनाम भारत संघ मामले में आया, जिसमें ओबीसी ‘नॉन-क्रीमी लेयर’ के निर्धारण को लेकर केंद्र सरकार की व्याख्या को चुनौती दी गई थी। मामले का केंद्र बिंदु 1993 के सरकारी आदेश और 2004 में जारी एक स्पष्टीकरण पत्र के बीच का विवाद था।
आय ही एकमात्र आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों तक पहुँचे। लेकिन यदि केवल आय को आधार बनाया जाए, तो यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
अदालत ने कहा कि किसी उम्मीदवार के माता-पिता किस श्रेणी की सेवा में हैं और उनकी सामाजिक स्थिति क्या है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी आय।
सरकारी और (पीएसयू ) सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (पीएसयू) पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग कर्मचारियों का सवाल
मामले में यह भी मुद्दा उठा कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग मानदंड लागू किए जा रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ अलग व्यवहार करना “शत्रुतापूर्ण भेदभाव” माना जा सकता है।
पृष्ठभूमि
ओबीसी में क्रीमी लेयर की अवधारणा पहली बार 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ फैसले में सामने आई थी। इसके बाद 1993 में केंद्र सरकार ने एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर यह तय किया कि सामाजिक रूप से आगे निकल चुके ओबीसी वर्गों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
समय के साथ आय की सीमा बढ़ाई जाती रही और वर्तमान में यह सीमा 8 लाख रुपये वार्षिक मानी जाती है। लेकिन आय को किस तरह गिना जाए और किन स्रोतों को शामिल किया जाए, इस पर लगातार विवाद होते रहे हैं।
प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर ओबीसी आरक्षण से जुड़े कई प्रशासनिक मामलों और भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। इससे उन मामलों की भी समीक्षा हो सकती है जिनमें केवल। आधार पर उम्मीदवारों को क्रीमी लेयर में रख दिया था।
हालांकि फैसले के प्रशासनिक प्रभाव और नए दिशा-निर्देशों को लेकर अंतिम स्पष्टता केंद्र सरकार और कार्मिक विभाग की ओर से आने वाले निर्देशों के बाद ही सामने आएगी।
ओबीसी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की ८ लाख रुपये वाली सीमा को समझना थोड़ा पेचीदा है, लेकिन आसान भाषा में इसका गणित यहाँ दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसले के बाद अब नियम और भी साफ़ हो गए हैं:
१. किन चीज़ों को ८ लाख में ‘नहीं’ गिना जाता? (सबसे ज़रूरी बात)
अक्सर लोग यहीं गलती करते हैं। ८ लाख की सीमा तय करते समय नीचे दी गई आय को नहीं जोड़ा जाताः
तनख्वाह (सैलरी): अगर माता-पिता नौकरीपेशा हैं (चाहे सरकारी हों, पीएसयू में हों या प्राइवेट में), तो उनकी तनख्वाह को इस ८ लाख की सीमा में नहीं गिना जाता।
खेती-बाड़ी से आयः खेती से होने वाली कमाई को भी इस सीमा से बाहर रखा गया है।
२. फिर ८ लाख में क्या गिना जाता है?
इस सीमा में केवल ‘अन्य स्रोतों’ से होने वाली शामिल होती है, जैसे:
अपना निजी व्यापार या बिज़नेस ।
मकान या दुकान का किराया।
बैंक से मिलने वाला ब्याज ।
शेयर बाज़ार या अन्य निवेश से होने वाला मुनाफ़ा।
३. माता-पिता के पद का महत्व (स्टेटस टेस्ट)
सिर्फ पैसा ही नहीं, माता-पिता का पद सबसे पहले देखा जाता है। अगर माता-पिता इन पदों पर हैं, तो आय चाहे जो भी हो, बच्चा ‘क्रीमी लेयर’ में ही आएगा:
अगर माता-पिता सीधे ‘ग्रुप ए’ (क्लास १) अफ़सर भर्ती हुए हैं।
अगर माता-पिता दोनों ‘ग्रुप बी’ (क्लास २) अफ़सर हैं।
संवैधानिक पद (जैसे राष्ट्रपति, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट के जज आदि)।
४. ३ साल का औसत
८ लाख की यह सीमा किसी एक साल की कमाई पर तय नहीं होती। इसके लिए पिछले लगातार ३ सालों की औसत आय देखी जाती है। अगर तीन साल का औसत ८ लाख से ऊपर है, तभी उम्मीदवार ‘क्रीमी लेयर’ में माना जाएगा।
ताज़ा फैसले का बड़ा बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने अब यह साफ़ कर दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ भेदभाव नहीं होगा।
पहले कई बार बैंक या पीएसयू कर्मचारियों की ‘तनख्वाह’ को भी ८ लाख की सीमा में जोड़ दिया जाता था, जिससे वे आरक्षण से बाहर हो जाते थे। अब कोर्ट ने कहा है कि इनके साथ भी सरकारी कर्मचारियों जैसा ही व्यवहार होगा -यानी इनके लिए भी ‘पद’ (पदोन्नति) मुख्य पैमाना होगा, न कि सिर्फ ‘तनख्वाह’।
