बलौदा, 7जनवरी ।
बलौदा का प्राचीन पहचान माघ महीने में लगने वाला जग मेला की वजह से जाना जाता था,
आज के आधुनिक युग में हम अपनी विरासत की धरोहर पहचान को भूलते जा रहें है।
समय समय पर लोगों को अपनी रीति रिवाज और परम्पराएं याद आती है जिसे संजोने के लिए लोग आगे आते है लेकिन उस परम्परा को निभाने मे हम पीछे हो जाते है।वर्षों से मड़ई रौताही और जग मेला बलौदा की पहचान रही।वर्षो पहले जब संचार और आवगमन का साधन नही हुआ करता था तब लोग अपनी फसल कटाई के बाद पूरे वर्षभर के लिए खरीददारी किया करते थे,जिसमें घर की अपनी जरूरत की रोजमर्रा की सामानों या बेटी बेटों का विवाह या अन्य कार्यक्रम की जरूरतें इसी मेले से पुरी होती थी।

मेला लगने का उद्देश्य-
जग मेला, मड़ई मेला हमारा समृद्ध परंपरा का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ में फसल कटाई के बाद मड़ई मनाए जाने की परम्परा है। हमारे प्रदेश की अर्थ व्यवस्था कृषि आधारित है। किसानी काम से निवृत होकर खुशियां मनाने का यह प्रमुख माध्यम है। आज आधुनिकता के युग में भी ऐसे आयोजन हमारी समृद्ध परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
मेले का महत्व –
विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों और धर्मों के बीच मेल-जोल बढ़ता है, अपनी विरासत को बचाने का विचार पैदा होता है, सामुदायिक एकता का भाव बनता होता है, मेले से लौटा व्यक्ति अपने साथ बहुत सारा ज्ञान लेकर जाता है, वह ज्ञान धार्मिक-अध्यात्मिक भी हो सकता है, सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक शिक्षाएं भी हो सकती हैं ।
मेले में व्यापार-
होटल वाले, मिठाई वाले – जलेबी, गुलाब जामुन, रसगुल्ला जैसे पारंपरिक मिठाइयां बेचते हैं। होटल, ठेला वाले – आइसक्रीम, ठंडाई, फालूदा चाट गुपचुप, आदि बेचते हैं। खेल और मेला खेल – गोलियों से निशाना लगाने वाले, ब्रेक डांस, हवाई झूला नाव ट्रेन,छोटी ट्रेन, मिक्की माउस, हेलिकाप्टर झूला, झूलाने वाले आदि। खिलौना बेचने वाले – बच्चों के खिलौने जैसे गुड़िया, रंग-बिरंगी चीजें।
घरेलू जरूरत की सामान, मनोरंजन के लिए टूरिंग टाकीज, लगती है।
मेला के लिए जगह की कमी
बढ़ती हुई नगरीकरण से अब बलौदा मे सार्वजनिक आयोजनों ,मेला आदि के लिए जगह की कमी हो गई है।
अंतिम उम्मीदों में –
लोगों की अपेक्षाएं अपने क्षेत्रीय और स्थानीय जनप्रतिनिधिओं से है नगर की सभी परम्पराओं एक उचित पहचान देने की।
