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आज मनाई जा रही आंवला नवमी ,आंवला वृक्ष के पूजन से अक्षय फल, सुख-समृद्धि और लंबी आयु का मिलेगा आशीर्वाद… आज के दिन से पिकनिक मनाते है।

 

बलौदा 30 अक्टूबर
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि यानी 30 अक्टूबर, गुरुवार को आंवला नवमी या अक्षय नवमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन स्नान, पूजा, तर्पण और दान से अक्षय फल की प्राप्ति होती है. घर परिवार की महिलाएं आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना करती हैं.

 

पं अखिलेश कृष्ण शास्त्री अमलेश्वर रायपुर ने बताया कि कार्तिक शुक्ल नवमी को भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष पर निवास करते हैं, इसलिए इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा विशेष रूप से की जाती है. इस अवसर पर अन्न, वस्त्र, दीपक और दान करने से कई गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है.आंवले का धार्मिक और आयुर्वेदिक दोनों दृष्टि से विशेष महत्व है. इसे भगवान विष्णु और लक्ष्मी का प्रिय वृक्ष माना गया है. आंवले के सेवन से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि इसका वृक्ष घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि भी लाता है. इस दिन वृक्ष की पूजा करने से पितरों को तृप्ति और परिवार को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है.

आंवला भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है, इसलिए भगवान के प्रिय मास कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए भोजन बनाना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए और खुद भी भोजन करना चाहिए। इस दिन इस कथा को भी आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ना चाहिए। और कार्तिक महात्म सुनना चाहिए।

आंवला नवमी का माता लक्ष्मी से है संबंध

आंवला नवमी से जुड़ी माता लक्ष्मी की भी कथा है। एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि वो भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एकसाथ करें। वो विचार करने लगीं कि किस तरह विष्णु और शिव की पूजा कैसे की जा सकती है। तभी उन्होंने सोचा तुलसी और बेल के गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी श्री हरि विष्णु को अत्यंत प्रिय है और बेल भगवान भोलेनाथ को,इसलिए उन्होंने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिह्न मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष की पूजा की, उस दिन कार्तिक मास की नवमी तिथि थी। तभी से नवमी तिथि थी और उसी दिन से इसे आंवला नवमी कहा गया। मां लक्ष्मी की पूजा से प्रसन्न होकर श्री विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन कराया। इसके बाद स्वयं ने भोजन किया। तभी से आंवला वृक्ष पूजन की यह परम्परा चली आ रही है।

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