बलौदा,4 सितंबर
शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक इस प्रक्रिया से गुजरता हुआ कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। अगर हम शिक्षा की तमाम परिभाषाओं को एक साथ रख दें और फिर कोई शिक्षा का अर्थ ढूंढे़ तो भी हमें कोई ऐसा अर्थ नहीं मिलेगा, जो अपने आप में पूर्ण हो। वर्तमान में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा से लिया जाता है।किंतु आज शिक्षा शब्द ने अपने अंदर का अर्थ इस कदर खो दिया है कि आज न उसके अंदर का संस्कार जिंदा है और न व्यवहार।
शिक्षा अपने समूचे स्वरूप में अराजकता, अव्यवस्था, अनैतिकता और कल्पनाहीनता का पर्याय बन गई है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद.
*गैर शिक्षकीय कार्य एक वजह*
बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है.
हालांकि काफी हद तक यह बात सही है कि स्कूलों में कुछ शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्कूल वक्त पर पहुँचते नहीं हैं बहाने रहतें है। शिक्षक वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है। आये दिन किसी मुद्दे को लेकर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया है। शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं।चाटुकारिता,राजनैतिक प्रश्रय,और बच्चो को ट्यूशन अनिवार्य करना।ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न लगना लाजिमी है।*लेकिन यह बात भी सही है कि बहुत से शिक्षक हैं, जो ईमानदारी से पढ़ा रहे हैं। उनके बच्चों में शैक्षिक गुणवत्ता की दक्षताएं हैं। फिर सभी शिक्षकों दोषी कैसे ठहराया जा सकता है।
**शिक्षा में पूर्व की मार पद्धति के नही होने से शिक्षक और छात्र के बीच एक भय था जो अब नही रहा।*
शिक्षा के गिरते स्तर के लिए शिक्षक दोषी हैं या यह शिक्षा व्यवस्था और उसको अपने हित में नियंत्रित-निर्मित करने वाली आर्थिक राजनीतिक शक्तियाँ? गिरते स्तर के लिए उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु शिक्षा से जुड़े घटकों यथा समाज, प्रशासन, शिक्षक पाठ्यक्रम स्वयं छात्र इत्यादि पर एक दृष्टि डालना उचित होगा।शिक्षा के गिरते स्तर के कारण उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होना लाजिमी है। लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग है। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा और न ही पालको का सामजिक चिंतन किया जा रहा है। शिक्षकों को समझाइश देते हैं कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करें। यह कैसी विडंबना है.
आमजन दोष देने के बजाय शिक्षकों को क्षमतावान बनाए “आज इस बात पर भी गौर करना है कि जिन बच्चों की शिक्षा के बारे में सरकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वे बच्चे किस तबके से आते हैं? उनकी सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शैक्षिक स्थिति के साथ स्वास्थ्य की स्थिति क्या है? क्या ये कारक इन बच्चों की शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे है? यदि हाँ तो फिर सरकार और उनके ये उच्च अधिकारी इस बारे में क्या सोचते हैं और क्या कर रहे हैं?आज यह स्पष्ट हो चुका है कि दोषपूर्ण शिक्षा नीति के साथ सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। वर्षभर शासकीय शिक्षकों से कई प्रकार के गैर शैक्षिक कार्य लिए जा रहे हैं, जिससे वे अपने छात्रों को पूरा समय नहीं दे पाते और उनके छात्र पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। निजी विद्यालय बुनियादी सुविधाओं का उचित प्रबंध रखते हैं। ‘‘आज सरकारी और निजी विद्यालयों में फर्क बहुत साफ नजर आता है। दोनों की पढ़ाई के स्तर में जमीन आसमान का अन्तर है। यह शिक्षा के निजीकरण का नकारात्मक पहलू भी है। आज हालात यह है कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी जगह-जगह ढेरों प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। लोगों में अंग्रेजियत का मोह और साथ ही प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ के कारण 70 से 80 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में दर्ज हो गए हैं।सरकारी विद्यालय की शिक्षा ‘‘आज गरीब से गरीब आदमी से बात कीजिए, चाहे वह वाहन चालक हो, ठेला लगाता हो या दिहाड़ी मजदूरी करता हो, इनमें से कोई भी अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ाना चाहता। सभी निजी विद्यालयों की ओर भाग रहे हैं, वह भी अंग्रेजी माध्यम की ओर। सर्व शिक्षा अभियान योजना के माध्यम से स्कूल न जाने वाले बच्चों का रुझान स्कूलों की तरफ होना यह साबित करता है कि शिक्षा पाने के लिए हर कोई गंभीर है।
शिक्षा के निजीकरण ने समाज के उच्च वर्गो के स्वार्थ के लिए अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का काम किया है। आज सरकारी स्कूल में समाज के सबसे पिछड़े व अति गरीब वर्ग के बच्चे ही सरकारी शिक्षा का अभिशाप झेलने के लिए विवश हैं।
एक तरफ सरकार शिक्षा में सुधार की योजनाएं बनाने में दिलचस्पी दिखाती है, तो दूसरी ओर योजनाओं के सही क्रियान्वयन की ओर कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं की जाती है? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा का ग्राफ दिन प्रतिदिन नीचे की ओर जायेगा। सरकार शिक्षा में किए जा रहे भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाये तो शिक्षा की गुणवत्ता कायम हो सकती है।बहरहाल, यदि गरीब का बच्चा सरकारी विद्यालय जाता है और उसे सही शिक्षा नहीं दी जाती है और वह शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद अनपढ़ रह जाता है, तो यह सरकार के लिए एक विचारणीय प्रश्न है। सबसे अहम बात यह है कि सरकार शिक्षा में किये जा रहे भेदभाव को मिटाने की ओर पहल करे। देश में समान शिक्षा प्रणाली लागू हो। सभी के लिए एक जैसा पाठ्यक्रम हो जिससे देश में समरसता का वातावरण बने और शिक्षा के निजीकरण ने अमीरों और गरीबों के बीच विषमता को बढ़ाने का जो काम किया है, वह कम हो सके।
